KAILASA Library/Sarvajnapeetha - Hinduism का थिंक टैंक/वैदिक कालSign in
Sarvajnapeetha - Hinduism का थिंक टैंक

वैदिक काल

वैदिक सभ्यता एक शाश्वत सजीव प्रबुद्ध सभ्यता है जिसे सनातन हिं दू धर्म कहा जाता है, जिसकी ऐतिहासिक निरंतरता मानव सभ्यता के आदिकाल अर्थात 19000 लाख वर्ष से बनी हुई है । इस सभ्यता की जननी हैं पवित्र देवभूमि भारतवर्ष, जो पृथ्वी लोक ही हैं, पर विशेषतर इसे 'भारत' या 'आर्यावर्त' कहा जाता है, जो सर्वोच्च पर्वत श्रृंखला हिमालय के नीचे का भूभाग है । हिमालय और समुद्रो से मिली परिपूर्ण सुरक्षा ने भारत को सर्वोत्तम जलवायु व भूगोल प्रदान करा है, जिससे यह क्षेत्र सुरक्षित, शांतिपूर्णवातावरण एवं प्रचुर प्राकृतिक सं साधनो ंसे सं पन्न रहा है । इन सभी दैविक व्य्वस्थाओ ने एक परम विकसित, महानतम प्रबुद्ध सभ्यता का सृजन व सं चार किया है, जिससे इसी धरती लोक पर मानव जाति ने देवताओ के भाति जीने का मारग् पाया ।

गंगा-सरस्वती सभ्यता के तट, लाखो प्रबु ं द्ध ऋषियोंव उनके शिष्यों की ्यों स्थली नैमिषारण्य वन में, अवस्थित है – अनन्त ज्ञान की अध्यात्मिक पीठ अथवा सर्वज्ञपीठ – जिस पर सर्व-ज्ञाता, सर्व-शक्तिमान, सर्व-व्यापी चेतना के स्रोत आदिगुरू महादेव विराजमान है । समस्त कामनापूर्ति के दिव्य वट 'कल्पवृक्ष' तले सर्वज्ञपीठ परम ज्ञान का स्पन्दन करता है, जिसे वैदिक ऋषियो ं की मन्त्र-दृष्टि आत्मसात करती हैं ।

वेद (पवित्र ज्ञान) जैसे ऋग्वेद और पुराण (दिव्य इतिहास) जैसे रामायण, महाभारत और श्रीमद भागवतम में नैमिषारण्य में साधू-सं तो की धर ं ्मसभा का विस्तृत वर्णन मिलता है – इन सभाओ की अध्यक्षता दिव्य अवतर व प्रबुद्ध ऋषि करते थे जैसे भगवान श्री वेदव्यास एवं शौनक ऋषि आदि । इस तपोभूमि पर विश्व के महानतम ग्रंथो की रचना हुयी और विश्व शांति, जगत कल्यण एवं मानव चेतना विकास हेतु विशाल अनुष्ठान व तप किये गये।

नैमिषारण्य, प्रबुद्ध मानवता की जागरुक आरण्य नगरी

नैमिषारण्य एक सदा-जागृत आदिकालीन आरण्य नगरी (उत्तर प्रदेश में) है । यह दिव्य ऊर्जाक्षेत्र है, जो एक सर्वप्रथम एवं प्राचीन वैदिक विश्वविधालय के रूप में मानव कल्याण हेतु सुप्रतिष्ठित हुआ; जहां सनातान हिं दू धर्म की जडो का ं मूलाधर है, जो काल के प्रभाव से भी अछूती हैं।

''सनातन धर्म या हिदंत् पर वु म सत्य का – सबसे शक्तिशाली, जटिल, सर्वाधिक प्रगतिशील, सबसे बुद्धिपूर्णव विवेकपूर्ण – प्रस्ततुीकरण है, जिसमे भावी विकास की सं भावना अन्तर्निहित है और आधुनिक संशोधन की भी सं भव्ता है।" ~ THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM

अत: नैमिषारण्य सर्वोच्च शिक्षण, अध्ययन और परम विज्ञान के प्रतिपादन का अधिकेंद्र था, जिसका विस्तार विशिष्ट शिक्षण एवं अनुसं धान वाले – नालंदा और तक्षशिला – जैसे प्रतिष्ठित वैशिवक आवासीय विश्वविधालयोंमे हुआ। यहां दीक्षा द्वारा ज्ञान का प्रतिपादन एवं सिद्धियो द्ं वारा शक्ति का प्रकटन गुरु परंपरा के अनुसार हुआ जो सजीव आत्मज्ञानी गुरुओ द्वारा शिष्यों को ्यों प्रबुद्धता प्रदान करने का निरंतर परंपरा चक्र है ।

प्राचीन वैदिक काल के ऋषियो - ं मुनियो ने ं सामूहिक चेतना का रूप धारण करके , दिव्य अनुसं धान एवं विकास कें द्रौ की स्थापना की थी । इन दिव्यात्माओ ने निस्वार्थ् भाव से लाखोंवर्षों के अध्यात्मिक अभ्यासो को समर्पित किया, केवल मानवता हेतु परम पावन सत्य के अन्वेषन, पोषण और सं रक्षण के लिये । उनके यथार्थ बोध एवं अध्यात्मिक अनुभूतियो को ं व्यवस्थित रूप से वैदिक ग्रन्थों मे अभिलेखित करके और गुरु-शिष्य की श्रुति परंपरा द्वारा शुद्ध रूप से प्रतिपादित किया गया । उनहोनें ज्ञान निधि और दिव्य शक्तियों को साध्य किया । अतः हर क्षेत्र जैसे विज्ञान, तकनीकी विज्ञान, ध्यान, उपचार, योग, चिकित्सा, शिक्षा और जीवन-पद्धति मे अनुसं धान सिद्धि उन्हेप्राप्य थी ।