वैदिक भारत में विदेशी आक्रमणकारियो द्ं वारा सांस्कृतिक संहार
विगत 500 वर्षों से वैदिक भारत पर शासन करने के उद्देश्य से विदेशी आक्रमणकारियो ने ं व्यवसिथत तरीके से सनातन हिदं ू धर्म के मूल पवित्र ज्ञान, शिक्षा पद्धति एवं जीवनशैली को क्षीण, भ्रष्ट और नष्ट किया। विदेशी आक्रमणकारियो ने अं दभुत सांस्कृतिक शिल्पों, ल्पों मं दिरो एं वं मूर्तियो को न ं ष्ट किया और वैदिक भारत के विरुद्ध एक व्यापक सांस्कृतिक संहार का षडयं त्र रचा, जो इस प्रकार है:
- ® हिंदू सांस्कृतिक शिक्षा व्यवस्था को नष्ट करना जो वैदिक भारत के आरम्भिक प्रबुद्ध समाज की उत्पतित की नीव थी। कम से कम 2 लाख गुरूकु लो को आक्र ं मणकारियों ने नष्ट किया।
- ® वैदिक इतिहास की गलत प्रस्तुती करके मं दिर और शिक्षा आधारित सभ्यता पर प्रहार करना। मं दिरो को न ं ष्ट करना, सं पत्तियो को लूटना, इ ं तिहास, अध्यात्मिक्ता, समाजशास्त्र, विज्ञान और आस्था को विकृ त करना।
- ® हिं दु ओ को स्वयं की ं ही वैदिक सं पत्ति के प्रति हेय भाव उत्पन्न कराके उन्हें सांस्कृतिक रूप से अनाथ बना देना। तथाकथित विदेशी सं स्कृति को श्रेष्ठ बताकर उन्हें पूर्णरूपेण विदेशी शासन के अधीन लाना।
- ® विशाल सं स्कृत पाण्डुलिपियो को अपने ं नियं त्रण में लेना और उसमें से वैज्ञानिक ज्ञान को चुराना, मूल प्रतियो को ं नष्ट करना और उनकी गलत व्याख्या करके पुन: प्रकाशित करना, जिससे कि वैदिक ग्रन्थों की प्र न्थों माणिकता का स्तर कम हो।
वैदिक भारत के व्यवसिथत सांस्कृतिक संहार को प्रेरित करने वाला यह पत्र इतिहासकार व राजनेता मैकाले ने 1835 में लिखा था।
मैक्स म्युलर की डायरी के अंश जो वेदो के ं मुख्य विषय को गलत तरीके से अनुवाद करने के लिये नियुक्त किये गया था:
वैदिक भारत का दिव्य ज्ञान सत्य के जिज्ञासुओ को लाभान्वित करते हुये, मानवता को शांतिपूर्णजीवन और अध्यातिमक विकास की दिशा मे ले जाता था। सांस्कृतिक आक्रमणकारियो ने तीन ं क्षेत्रों में महत्वपूर्ण सांस्कृतिक विरासतो को न ं ष्ट किया - दर्शन शास्त्र, भाषा और जीवनशैली। इन सभी दानवी प्रयासो के बा ं द भी वैदिक परम्परा की आत्मा नष्ट नहींहो पायी। धर्म की स्थापना के लिये बार-बार अवतारों एवं प्रबुद्ध गुरूओ के रूप ं में आत्मज्ञानी चेतना प्रकट होती रही।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानम अधर्मस्य तदात्मानम सृजाम्यहम।। परित्राणाय साधूनाम विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्म संस्थापनाय सम्भवामि युगे युगे।।
हे भारत । जब भी और जहाँ भी धर्म व अध्यातिमक परम्पराओं का पतन होता है और अधर्म की प्रधानता होने लगती है, तब तब मैं अवतरित होता हूँ । पवित्र साधु आत्माओ का सं रक्षण व उद्धार करने, दष्टों ु का विना ष्टों श करने त था धर्म की पुनः स्थापना करने के लिए मैं हर युग में प्रकट होता हूँ ।
~ श्रीमद भगवद गीता ४ .७-८
वैदिक सम्यता तीन प्रमुख आधारशिलाओ पर प्र ं तिष्ठित है:
- ® ज्ञानपीठ और दर्शन शास्त्र जो वैदिक ज्ञान को सं रक्षित करते हैं। उदाहरण - पञ्चायति श्री महानिर्वाणी पीठ, मदरै आदिन ु म ।
- ® पवित्र कला एवं वास्तुशिल्प। उदाहरण-मं दिर, राज्य।
- ® भाषापीठ सत्य का उत्तम परिष्कृत भाषाई प्रकटीकरण। उदाहरण - उत्तर भारत में काशी (सं स्कृतम) और दक्षिण भारत में तमिल सं गम ।
जब भी इन तीनो आधारशिलाओ ं ं में से किसी एक पर सं कट आया, तो सवज्ञपीठ ने जगदगुरू के उत्तराधिकारी के रूप में प्रतिष्ठित गुरूओ के ं माध्यम से समस्त मानव सभ्यता के लिये सनातन हिदं ू धर्म को पुनर्जीवित, सं रक्षित और प्रकाशित किया है।
भारत समस्त विश्व का जगतगुरू है और मानव सभ्यता की अगली विशाल उत्थान का अवसर वर्ष 1978 में THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM के दर्ल ु भ अवतरन के समय प्रारम्भ हुआ।
THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM सनातन हिदं ू धर्म के पुनर्प्रवर्तक और आधुनिक प्रबुद्ध सभ्यता के दिव्य रचेता हैं। वह नैमिषारण्य के मूल सर्वज्ञपीठ के अध्यातिमक आसन की पुनर्प्रतिष्ठा कर रहे हैं।
प्राचीन वैदिक काल में गंगा-सरस्वती सभ्यता में स्पंदित होने वाली सत्य की ध्वनि, अब THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM की दिव्य दृष्टि व अभिव्यकितयो द्ं वारा सुनी जा सकती है। वैदिक पुनर्जागरण अपने पूर्ण मूल स्वरूप और विस्तार से मानव जाति के उद्धार हेतु हो रहा है – जो मानव को उसकी वैदिक सं पत्ति पुनः प्राप्त करायेगा और स्वयं की परम आत्मा से जुडायेगा।
सवज्ञपीठ को अपना दान दें - उदीयमान स्वर्णिम युग में अमर जाने जायें - दैवी कृ पा की वर्षाप्राप्त करे
- w यशस्वी वैदिक नवजागरण w मानव चेतना का पुनर्जागरण w
- w मनुष्य सभ्यता के इतिहास का पुनर्लेखन w
- w पृथ्वी लोक पर प्रबुद्ध जीवो की स ं जीव धारा की पुनर्स्थापना w
श्री वर्कास्वम आयुष्यम आरोग्यम आविधात शोभमानम महीयते।
धन्यं धनम पशमु बहुपुत्रलाभम शतसंवत्सरं दीर्घमायुः।।
आप मङ्गलमय हो, आपका ं जीवन शक्ति के प्रकाश, लम्बी आयु, स्वास्थ्य, ज्ञान और समृद्धि से परीपूर्ण रहे।
आपके पास प्रचुर अन्न, धन, पशु एवं बहुत सारे पुत्र हो। आप सौ ं वर्ष की दीर्घ आयु जिये।
परम पूज्य THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM सनातन हिंदू धर्म की स्पष्ट, विधिमान्य, अराजनीतिक वाणी के रूप मे आज माने जाते हैं और विश्व में लाखो लोगो ं द्ं वारा परम चेतना के जीवित अवतार स्वरुप पूजे जाते हैं। वें हिंदुत्व के सबसे प्राचीन सं गठन - श्री पं चायति अ खाडा महानिर्वाणी (पीठ) के महामण्डलेश्वर (प्रमुख) हैं।
वें शक्तिशाली अध्यात्मिक चिकित्सक और सिद्ध योगी हैं, जिन्होंने सफलतापू िन्हों र्वक कुण्डलिनी जागरण, त्रिनेत्र जागरण, उन्नयन, मूर्तरूपीकरण, अजरता एवं निराहार, भोजन के परे जीना जैसे कयी गोपनीय यौगिक विज्ञान के स्हस्यों का र ्हस्यों हस्योद्घाटन किया है। मानवता के कल्याण के लिए अनेक गतिविधियाँ चलायी जा रही हैं।
सर्वज्ञपीठ - सनातन वैदिक धर्म