KAILASA Library/Sarvajnapeetha - Hinduism का थिंक टैंक/का पुनर्जागरण नव-प्रबुद्ध सभ्यता के अवतार व सिष्टिकर्ताSign in
Sarvajnapeetha - Hinduism का थिंक टैंक

का पुनर्जागरण नव-प्रबुद्ध सभ्यता के अवतार व सिष्टिकर्ता

मदु रै आदिनम के प्रमुख का पट्टाभिषेक, मदु रै, दक्षिण भारत

हिं दूत्व का उत्तरदायित्व लेना

महामंडलेश्वर, श्री पं चायती अखाड़ा महानिर्वाणी के प्रमुख के रूप में

परम पूज्य THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM का वर्श 2013 में प्रख्यात श्री पं चायती अखाड़ा महानिर्वाणी (महानिर्वाणी पीठ), सर्वप्राचीन वैदिक सनातन हिंदू सांस्कृतिक सं स्थान के महामंडलेश्वर के रूप में पट्टाभिषेक किया गया ।

अखाड़ा सनातन धर्म के शक्तिशाली धर्मके सरी के रूप में मान्य, THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM अपनी महामंडलेश्वर की भूमिका में अखाड़े की असंख्य शाखाओ के सा ं मूहिक विश्वरूप एवं ठोस आध्यात्मिक परंपरा की शक्ति को आत्मसात करते हुए उसे एक नवीन प्रबलता एवं जीवन शक्ति प्रदान कर रहे हैं ।

श्री पं चायती अखाड़ा महानिर्वाणी के १००८ महामंडलेश्वर के रूप में परम पूज्य THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM का 'महामंडलेश्वर पट्टाभिषेक समारोह' आयोजित किया गया था, अखाड़े के आध्यात्मिक प्रमुख श्री आचार्यों और साधुओ के दि ं व्य सानिध्य में, महानिर्वाणी अखाड़ा छावनी, कुम्भ मेला शिविर, प्रयागराज में । दिनांक १२ फरवरी २०१३ को ।

श्री पं चायती अखाड़ा महानिर्वाणी सबसे पहला सं स्थापित अखाड़ा हैं । अखाड़े सनातन धर्म की सभी हिदं ू सम्प्रदायो का सं पू ं र्णता से समन्वय करके , जैसे की – शैव, वैष्णव, ब्रह्मा, शाक्त, सिख, जैन और बौद्ध धर्म समेत का प्रतिनिधित्व करते है । अखाड़ा महानिर्वाणी की क्रमागत परंपरा १० हजार वर्ष पुरानी है और इस सांस्कृतिक सं स्थान का औपचारिक रूपसे नामकरण ७४८ ईसवी में हुआ, एक अतिशुभ घटना के उपरांत ।

७४८ ईसवी में श्री अटल अखाड़े के सात साधुओ ने गंगासागर पर तपस्या की, जिसके फलस्वरुप उन्हेंश्री कपिल महामुनि जी के दिव्य दर्शन प्राप्त हुये । उनके आशीर्वाद से उन्होंने न्हों हरिद्वार के पास नीलधारा में, 'श्री पं चायती अखाड़ा महानिर्वाणी' के विधिवत नाम से नागा परंपरा को पुनःजागरण किया । आज भी अखाड़ा महानिर्वाणी के मुख्य उपास्य देवता श्री कपिल महामुनि जी हैं, जो पौराणिक काल से प्रख्यात हैं ।

श्री कपिल महामुनि जी की जीवंत मूर्ति, श्री नित्यानंदेश्वर देवस्थानम, नित्यानंद पीठम, बैंगलुरू आदिनम

(ऊपर) : श्री कपिल महामुनि जी देव, श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी

श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी का नियुक्ति-पत्र और 'महामंडलेश्वर पट्टाभिषेक समारोह' का आमं त्रण पत्र, दिनांक १२ फरवरी २०१३, जो घोषणा करता है – परम पूज्य THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM को 'महामंडलेश्वर' के सम्मानित पद पर ।

(दायी ओर): नियुक्ति-पत्र का अंग्रेजी में अनुवाद

२७ अप्रैल २०१२ को परम पूज्य THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM का विश्व की सबसे प्राचीन जिवंत हिदं ू धार्मिक सं स्थान, मदरै आदिन ु म के प्रमुख - गुरु महासंनिधानम के पद पर अभिषेक हुआ। मदरै आदिन ु म के २९३ गुरु महा संनिधानम के पद का उत्तरदायित्व लेते हुए THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM ने मदरै आदिन ु म और उनके साथ जुड़े हुए ४ मं दिरो को महान प्रसिद्धि लाने की शपथ ली ।

प्रसिद्द मदरै आदिन ु म अति प्राचीन काल से अस्तित्व में है । किन्तु, दक्षिण हिंदू शैव सिद्धांत तत्वज्ञान के चार दूरदर्शी सं तो मे से एक, आत्मज्ञानी युवा सं त, तिरुज्ञान सम्बदर जी ने १५०० वर्ष पूर्व उसको पुनर्जीवित किया | आदिनम मदरै ु में स्थापित है, जो भारत के सबसे प्राचीन नगरोंमे एक है, जिसका इतिहास तीसरी शताब्दी ई.पू के तमिल सं गम काल तक जाता है ।

मदरै के पीठासीन ु देवता श्री सुन्दरेश्वर और मीनाक्षी अवतार में भगवन शिव और देवी हैं, जो जग प्रसिद्द मदरई ु श्री मीनाक्षी सुन्दरेश्वर मं दिर मे प्रतिष्ठापित है ।

मदरै आदिन ु म के प्रमुख, गुरु महा संनिधानम के नाम से ज्ञात होते है, जो तिरुज्ञान सम्बंदर जी की परंपरा को आगे ले जाने के उत्तरदायित्व के पवित्र कर्य को विरासत में पाते है । इस पद का कोई निश्चित कार्यकाल नहींहोता है, और यह एक आजीवन सम्मान है ।

हिं दू मं दिरो की स् ं थापना

तिरुज्ञान सं बन्दर जी, बाल सं त अवतार

प्राणप्रतिष्ठा की रहस्यमय विधि

मूर्तियोंमें प्राण शक्ति को श्वाषित करके उन्हेंजीवित देवता में प्रतिष्ठित करना, जो स्वयं मे स्वतंत्र चेतना व बुद्धि बन जाते है।

केवल जीवित अवतार ही इस दर्ल

ु भ रहस्यमय क्रिया को सं पूर्ण

कर सकते हैं। सामान्य मं दिरो में पुजारी मं त्र प्रतिष्ठा द्वारा देवता

की ऊर्जा का आह्वान करते हैं।

श्री सदाशिव उवाच यो यद्देवप्रतिक्रतिम् प्रतिष्ठापयति प्रिये। सा तल्लोकमवाप्नोति भोगानपी तदद्भु वान् ।। इष्टकाग्रहदाने तु तस्माच्छतगुणम् फलम्। ततोऽयुतगुणम् पुण्यम शिलग्रहप्रदानतः ।। 25।।

भगवान श्री सदाशिव ने कहाः हे प्रिय देवि। वह व्यक्ति जो प्रतिष्ठा करता है, जो कि पदार्थमें श्वासमय जीवन प्रतिष्ठित करके विशेष देवता के रूप में निर्माण करने का विज्ञान है, वह उसी देवता के लोक को प्राप्त हो उस लोक के आनंद का अनुभव करता है। ईंटो से बने मंदिर का दान करके, व्यक्ति उसका फल सौ गुणा पाता है। पत्थर के मंदिर का दान करके व्यक्ति ऐसा पुण्य प्राप्त करता है जो दस-हजार गुणा अधिक होता है।

~ महानिर्वाणतंत्रम, त्रयोदश उल्लास

वैचारिक रूप से मंदिर को भगवान् का भौतिक स्वरुप माना जाता है | गर्भ गृह को शीर्ष व गोपुर को भगवान के चरणो प्रतीक माना जाता है| सुकनासी या अर्धमंडप (गर्भ गृह के आगे का छोटा घेराव) नाक को; अन्तराल गर्दन को; विभिन्न मंडप शरीर को; पराकारस हाथ को दर्शाता है | लम्बरूप में गर्भ गृह गर्दन को दर्शाता है, शिखर (गर्भ गृह की उपरी अधिरचना) शीर्ष को और कलश शिखा को दर्शाता है |

At Sri Nithyanandeshwar Devasthanam are seated (center) the presiding deities of Sri Nithyanandeshwara and Nithyanandeshwari (Lord Shiva and Devi) blessing the world, along with the deities