KAILASA Library/Sarvajnapeetha - Hinduism का थिंक टैंक/हिन्दू मंदिर क्या है?Sign in
Sarvajnapeetha - Hinduism का थिंक टैंक

हिन्दू मंदिर क्या है?

वैदिक परंपरा और हिन्दू जीवन के हृदय मे पवित्र मंदिरों की परंपरा विद्यमान है। मन्दिर या देवालय देवताओ के निवास का ऊर्जा केंद्र है। वैदिक सभ्यता में कोई भी मानव सभ्यता मंदिरों के चारो ं ओर पु ंष्पित-पल्लवित हुयी है। इस कारण हिन्दुत्व मंदिर पर आधारित सभ्यता के रूप में स्थापित किया गया, जो नित्य उत्सवो की परंपरा है।

प्रत्येक मंदिर एक प्रबुद्ध गुरू या अवतार द्वारा उत्पन्न की गयी ऊर्जा परिपथ होता है

और हजारो वर्ष तक यह ऊर्जा को धारण करता है। मंदिर से जुडे अनुष्ठान व विधियां विभिन्न ऊर्जाओ का आवाहन व प्रकीर्णन करने की प्रक्रिया होती हैं। अवतार ब्रह्माणडिय ऊर्जा का वहन कर उसे मंदिरोंमे स्थापित करके, उसे सारे विश्व मे प्रसारित करते हैं, जिससे मानवता को आत्मज्ञान का अनुभव हो और दिव्य शक्तियां, उपचार और इच्छापूर्ति भी प्राप्त हो।

हिं दू धर्ममें देवमूर्ति पूजा नहींहोती है । पूजा देव मूर्तियो के 'द्वारा' की जाती है। शिक्षण, शिल्पकला, जीवनशैली व उत्सव, सभी जीवन व कार्य प्रणालीयां मंदिर परम्पराओं पर ही आधारित होते हैं। यह देव मूर्तियां, जो शुद्ध चेतना के 'अर्चावतार' रुप मे जीवित है, इनके प्रति भक्ति के प्रबल भाव से ही हमें दिव्यता से अद्वैत भाव या एकत्व की परम अनुभूति होती है ।

हिं दूमं दिरो को स ं दा राजाओ और ं व्यक्तिगत दानदाताओ द्वारा पोषित किया गया है, जिससे उन्हें महापुण्य प्राप्त होते है । मं दिरो को ं मुद्रा, स्वर्ण, चांदी, पशु और धरती दान किये जाते थे। ऐसे दानो ने आज तक वैदिक परंपरा को जीवित रखने और समृद्ध बनाने में महत्वपूर्ण काम किये हैं।

हिदू मंदिर, मानवता व विश्व के परम कल्याण हेतु ब्रह्माण्डीय ऊर्जा केंद्र

अद्वैत भक्ति, जागृत देव मूर्तीयो द्वारा एकत्व की पूजा

श्री नित्यानं देश्वर देवस्थानम नित्यानंद पीठम, बेंगलुरु आदिनम, भारत

नित्यानंद पीठम बेंगलुरु आदिनम के पवित्र गर्भमंदिर में THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी द्वारा पीठासीन देवता श्री नित्यानंदेश्वर एवं नित्यानंदेश्वरी (भगवान शिव और देवी) की पवित्र पूजा-अर्चना ।

बेंगलुरु आदिनम् में कल्पवृक्ष - पवित्र वटवृक्ष की पूजा ।

THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी ने समस्त विश्व में आगम शास्त्रों और स्त्रों पद्धतियो पर आधार ं ित हिं दूमं दिरो की स् ं थापना की है, जिनसे लाखों लोगो को सं ं मृद्ध और परिपूर्णवैदिक परंपरा को जीना, शिक्षित होना व लाभान्वित होने की प्रेरणा मिल रही है। आज धरती पर परम आवश्यकता है अधिक मं दिरो की, ज ं िससे मानव को दिव्यता से सीधे जुड़ने और समावेश होने का साधन मिलें एवं सकारात्मक और शांतिपूर्ण ब्रह्माण्डीय ऊर्जा केंद्रों की स् द्रों थापना हो ।

''मं दिर ऐसे उपग्रह प्रसारण केंद्र की भाति होते हैं जहां पर अति तीव्र अध्यात्मिक ऊर्जा उत्पन्न करके समस्त विश्व में भेजा जाता है - जिससे कि मानवता को भौतिक, मानसिक, भावनात्मक और सबसे ऊपर अध्यात्मिक उपचार में सहायता मिले। दैवमूर्ति की पूजा द्वारा हमने मूर्तियोंमें दिव्यता को प्रवेश कराने का विज्ञान और पाषाण का ईश्वर मे परिवर्तन को साध्य लिया है।"

~ THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी

यह वटवृक्ष एक कल्पवृक्ष, अर्थात वरदयी दिव्य वृक्ष हैं, जिसने अनगिनत श्रद्धापूर्णप्रार्थनाओ को फलीभूत किया है। वटवृक्ष के आधार में एक गुहा जैसा कन्दरा है जहाँ पर एक दिव्य स्वयम्भू लिङ्गम (प्राकृतिक रूप से प्रकट शिवलिङ्गम) प्राप्त हुई थी, जिसे श्री नित्यानंदेश्वर मंदिर में विधिवत प्राणप्रतिष्ठित किया गया है।

सहस्त्र वर्षों से यह वटवृक्ष ने अपनी पत्तियां यहाँ बिखेरी हैं । स्वास्थ्यप्रद ऊर्जा से भरपूर इस दिव्य क्षेत्र में शारीरिक, भावनात्मक एवं आध्यात्मिक स्तर पर रोगमुक्ति मिलती है। THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी को यही वटवृक्ष का दृष्टिगोचर हुआ था, जिसके उपरांत उन्होंने यहों आश्रम की स्थापना की । इसका दैविक सं बन्ध 'शं भाला क्षेत्र' से है जो जागृत गुरुओ का अलौल ं िक क्षेत्र है।

यहाँ तीन दिव्य वृक्ष पाए जाते हैं: अथी (पवित्र अंजीर), अला (वटवृक्ष) और आरसा (पीपल), जो बिना फू ल के ही फल धारण करते हैं। वैदिक धर्ममें इन पवित्र वृक्षौं को क्षौं श्री वनस्पति या 'वन के देवता' के नाम से जाना जाता है। जहाँ यह तीन वृक्ष एक साथ स्थापित होते हैं, वहां साक्षात भगवान शिव जी का निवास होता है।

(बांए) स्वयम्भू लिङ्गम, स्वयं प्रकट हुआ शिवलिङ्गम, जो नित्यानंदेश्वर मंदिर के मुख्य गर्भगृह में स्थापित है, और पूर्व मे वटवृक्ष की गुहा में पाया गया (दाएं )।

पवित्र वटवृक्ष, नित्यानंद पीठम, बेंगलुरु आदिनम में अपनी विशाल दैविक शाखाएं फै लाए हुए । नीचे विराजमान हैं श्री दक्षिणामूर्ति भगवान शिव जी के आदिगुरु (प्रथम गुरु) के रूप में ।

श्री दक्षिणामूर्ति जी (दक्षिणाभिमुख देवता) भगवान शिव जी कें 'आदिगुरु' - धरति के अनादि एवं प्रथम गुरु के रूप में विराजमान हैं। वें चिर-यौवन अवस्था में परम मौन में दिव्य ज्ञान का स्पन्दन करते हैं और व्रिद्ध सं तो से परिक्षेपित हैं।

आदिगुरु श्री दक्षिणामूर्ति जी, श्री नित्यानंदेश्वर देवस्थानम, बेंगलुरु आदिनम में स्थित दिव्य वटवृक्ष की छावनि के तले ।

श्री नित्यानंद वेंकटेश्वर, भगवान श्री नारायण या श्री विष्णु का 11 फु ट का जीवंत 'अर्चावतार' स्वरुप हैं। वें जीवो पर आ ं शीर्वाद और वरों की कृ पावर्षा करते हैं। अति विराट रुप में देवमूर्तियो की प्राण-प्रतिष्ठा करने की वैदिक परंपरा, हिंदू मं दिरो या देवालयो का गौर ं व है, जहां हम सर्वव्यापी परमात्मा से समीपता से जुड़कर उनके साक्षातकर रुप के दर्शन प्राप्तकर उत्सव मनाते हैं ।

विराट रुप में सजीव देवमूर्तियां

भगवान श्री कालभैरव जी - काल और आकाश मंडल के महादेवता हैं, जो भगवान शिव जी महादेव कें एक अति शक्तिशाली स्वरूप हैं। क्षेत्रपालक या ऊर्जाक्षेत्र के रक्षक के रूप में वें सभी मं दिरो के द्वार पर सदैव उपस्थित हैं। वें महाँ-सिद्धियों व शक्तियो के देवता हैं, और वें विपत्तियो और शक्तिहीनता का नाश करके पूर्णत्व एवं मुक्ति प्रदान करते हैं।

भगवान श्री कालभैरव जी, नित्यानंद पीठम, बेंगलुरु आदिनम के प्रवेशद्वार पर विद्यमान ।

हिदं ू उत्सवो और प ं र्वो में पवित्र नाम-कीर्तन के सा थ मं दिर में उत्सवयात्रा ओ का आयो ं जन, नित्यानंद पीठम, बेंगलुरु आदिनम में ।

श्री आनन्दलिङ्गम, दर्ल ु भ व दिव्य 21-फु ट शिवलिङ्ग जो नित्यानंद पीठम, बेंगलुरु आदिनम मे स्थपित है। श्री आनन्दलिङ्गम घिरा हुआ है – रोगमुक्त करने वाले स्वास्थ्यप्रद जल 'तीर' से और 1008 ्थ शिवलिङ्ग से, जो विश्व में चिकित्सा ऊर्जा और शांति के दिव्य प्रकाश को फै लाते है ।

(बांए): थेप्पोत्सवम - तहरती नौका का उत्सव, जिसमे देवता या गुरु पवित्र तीर्थ जल मे दिव्य दर्शन और आशीर्वाद देते हैं ।

वैदिक परंपरा का ध्वज स्तम्भ ऊँ ची उड़ान भरे और सबको आशीर्वाद मिले

'ध्वज' जो मं दिरो के उच्च स्त ं म्भों पर ल म्भों हराता है, यह सनातन हिदं ू धर्म या हिदं त्वु की प्रभुता की अनन्त्ता का प्रतिचिह्न हैं । हर नेत्र जो आशापूर्वक सत्य, शान्ति, धर्म आदि की खोज करते है, उन नेत्रो को मीलोंदूर से यह ध्वज स्तम्भ एक आश्वस्त दर्शन और पुकार है, जिसे देखकर वें दिव्यता से सं बन्ध बनाने का मार्ग पतें हैं।

हिदं ू पर्वों पर 'ध्वजारोहण' समारोह नित्य उत्सव अथवा अनन्त उत्सव के प्रारम्भ की घोषणा करते हैं ।

THE SUPREME PONTIFF OF HINDUISM BHAGAWAN SRI NITHYANANDA PARAMASHIVAM जी पवित्र 'ध्वजारोहण' करके उत्सवो के प्रारम्भ का सं के त देते हुए । विश्व पर आशीर्वाद की कृ पावर्षाहेतु अग्नि देवता को समर्पित पवित्र यज्ञ सं स्कार।

'रथोत्सव' मं दिरो और पीठासीन देवताओ की भव्यता के उत्सव का एक अभिन्न अंग हैं। उत्सवों व पर्वों के समय प्रमुख देवताओ को वि शाल रथोंमें आसीन कर यत्रा करायी जती है, जिससे हर ह्रदय को ईश्वर के दिव्यदर्शन मिलें ।

दिव्य रथोत्सव, नित्त्यानन्द पीठम, बेंगलुरु आदिनम में आयोजित।

महा होम और यज्ञ, यह अग्नि देव को आहुति के विशाल अनुष्ठान होते है, जिन्हे विधि नियमित क्रियाओ से विश्व शांति व मानव कल्याण और आशीर्वाद हेतु आयोजित किया जाता हैं।

अतिरुद्र महायज्ञ 2015 - कई दिनो तक किया जाने वाला अनुष्ठान, यह अति शक्तिशाली अग्नि होम, जिसमे 'श्री रुद्रम' के निरंतर मन्त्रोच्चारण द्वारा भगवान शिव जी की कृ पा का आवाहन किया जाता है, विश्व शांति हेतु।